रायगढ़, 07 फरवरी 2026/sns/- संसदीय लोकतंत्र में जब जन-प्रतिनिधि अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा, संवेदनशीलता और साहस के साथ करते हैं, तब न्याय केवल एक अवधारणा नहीं, बल्कि साकार यथार्थ बन जाता है। भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) द्वारा 22 जनवरी 2026 को जारी किए गए समयपूर्व सेवानिवृत्ति के आदेशों को वापस लेना तथा 23 कर्मचारियों की सेवा बहाल करना, इसी लोकतांत्रिक सक्रियता और जनहित में की गई प्रभावी हस्तक्षेप का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस ऐतिहासिक निर्णय और न्याय की बहाली का सर्वाधिक तथा मुख्य श्रेय माननीय केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री श्री एच. डी. कुमारस्वामी को जाता है। उन्होंने इस संवेदनशील विषय में एक सच्चे अभिभावक की भूमिका निभाई। जैसे ही यह मामला उनके संज्ञान में आया, उन्होंने न केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं की सूक्ष्मता से समीक्षा की, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी कर्मचारी के साथ अन्याय न हो। उनकी दूरदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक प्रतिबद्धता के कारण ही प्रशासन को अपनी त्रुटियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारना पड़ा और 31 वर्षों से सेवारत श्री एम. के. भगत सहित सभी प्रभावित कर्मचारियों को न्याय मिला।
इस न्याय-यात्रा में जमीनी स्तर पर सबसे निर्णायक भूमिका राज्यसभा सांसद (छत्तीसगढ़) श्री देवेंद्र प्रताप सिंह ने निभाई। एक प्रतिष्ठित आदिवासी नेता होने के नाते उन्होंने न केवल अपने क्षेत्र, बल्कि अपने समाज की पीड़ा को गहराई से समझा। जब उनके संसदीय क्षेत्र की निवासी श्रीमती सुनीता भगत (पत्नी—श्री एम. के. भगत) ने अपनी व्यथा उनके समक्ष रखी, तो उन्होंने इसे मात्र एक आवेदन नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के सम्मान और नागरिकों के अधिकारों की लड़ाई के रूप में लिया। जिस दृढ़ता, आत्मीयता और संवैधानिक अधिकार के साथ उन्होंने इस मुद्दे को उठाया, वह एक आदर्श जनप्रतिनिधि के कर्तव्यबोध का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इस प्रयास को और अधिक बल मिला वरिष्ठ सांसद तथा संसदीय समिति (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति कल्याण) के अध्यक्ष श्री फग्गन सिंह कुलस्ते के प्रभावी हस्तक्षेप से। उनके व्यापक संसदीय अनुभव और सशक्त नेतृत्व ने यह सुनिश्चित किया कि प्रशासन इस गंभीर विषय को नज़रअंदाज़ न कर सके और उसे उत्तरदायित्व के दायरे में आना ही पड़ा। हालाँकि, इस पूरे प्रकरण में BHEL की एक अत्यंत गंभीर, संवैधानिक रूप से आपत्तिजनक और निंदनीय गलती भी उजागर हुई है। समयपूर्व सेवानिवृत्ति से संबंधित आधिकारिक अभिलेखों में कर्मचारियों की जाति श्रेणी (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/सामान्य) का उल्लेख किया गया, जबकि किसी भी कर्मचारी की कार्यकुशलता, ईमानदारी, आचरण या सेवा-निष्ठा के मूल्यांकन में जाति का कोई भी प्रासंगिक या वैधानिक आधार नहीं हो सकता। ऐसे संवेदनशील प्रशासनिक निर्णयों में जाति का समावेश न केवल पूर्णतः अनावश्यक है, बल्कि यह परोक्ष भेदभाव (Indirect Discrimination) की गंभीर आशंका को जन्म देता है। यह कृत्य सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की संवैधानिक गारंटी प्रदान करने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 की भावना और उद्देश्य के प्रतिकूल है। यह प्रवृत्ति BHEL जैसी प्रतिष्ठित सार्वजनिक उपक्रम की प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाती है और संविधान की मूल आत्मा—समानता, न्याय और निष्पक्षता—पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
यह पूरा घटनाक्रम यह भी स्पष्ट करता है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में संवेदनशील शासन, जवाबदेह प्रशासन और अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचाने की प्रतिबद्धता केवल कथनों तक सीमित नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई में परिलक्षित होती है। सुशासन तथा सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के सिद्धांतों पर चलती सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि सार्वजनिक उपक्रमों में भी अन्याय के विरुद्ध त्वरित, निष्पक्ष और निर्णायक हस्तक्षेप संभव हो सके। अंततः, यह पूरा प्रकरण यह भी सिद्ध करता है कि संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत स्थापित राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग केवल एक औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि अधिकारों की रक्षा का एक सशक्त संवैधानिक प्रहरी है। आयोग द्वारा समय पर की गई कार्यवाही और रिपोर्ट तलब करने के निर्देशों ने एक प्रभावी सेफ्टी वाल्व का कार्य किया। केंद्रीय मंत्री का निर्णायक नेतृत्व, स्थानीय सांसद की मजबूत और संवेदनशील पैरवी, वरिष्ठ सांसद का मार्गदर्शन तथा संवैधानिक आयोग की सख्ती—इन सभी के संयुक्त प्रयासों से 23 कर्मचारियों और उनके परिवारों के जीवन में फिर से सम्मान, सुरक्षा और खुशियाँ लौट आई हैं।
रायगढ़ 06 फरवरी 2026/ संसदीय लोकतंत्र में जब जन-प्रतिनिधि अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा, संवेदनशीलता और साहस के साथ करते हैं, तब न्याय केवल एक अवधारणा नहीं, बल्कि साकार यथार्थ बन जाता है। भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) द्वारा 22 जनवरी 2026 को जारी किए गए समयपूर्व सेवानिवृत्ति के आदेशों को वापस लेना तथा 23 कर्मचारियों की सेवा बहाल करना, इसी लोकतांत्रिक सक्रियता और जनहित में की गई प्रभावी हस्तक्षेप का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस ऐतिहासिक निर्णय और न्याय की बहाली का सर्वाधिक तथा मुख्य श्रेय माननीय केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री श्री एच. डी. कुमारस्वामी को जाता है। उन्होंने इस संवेदनशील विषय में एक सच्चे अभिभावक की भूमिका निभाई। जैसे ही यह मामला उनके संज्ञान में आया, उन्होंने न केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं की सूक्ष्मता से समीक्षा की, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी कर्मचारी के साथ अन्याय न हो। उनकी दूरदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक प्रतिबद्धता के कारण ही प्रशासन को अपनी त्रुटियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारना पड़ा और 31 वर्षों से सेवारत श्री एम. के. भगत सहित सभी प्रभावित कर्मचारियों को न्याय मिला।
इस न्याय-यात्रा में जमीनी स्तर पर सबसे निर्णायक भूमिका राज्यसभा सांसद (छत्तीसगढ़) श्री देवेंद्र प्रताप सिंह ने निभाई। एक प्रतिष्ठित आदिवासी नेता होने के नाते उन्होंने न केवल अपने क्षेत्र, बल्कि अपने समाज की पीड़ा को गहराई से समझा। जब उनके संसदीय क्षेत्र की निवासी श्रीमती सुनीता भगत (पत्नी—श्री एम. के. भगत) ने अपनी व्यथा उनके समक्ष रखी, तो उन्होंने इसे मात्र एक आवेदन नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के सम्मान और नागरिकों के अधिकारों की लड़ाई के रूप में लिया। जिस दृढ़ता, आत्मीयता और संवैधानिक अधिकार के साथ उन्होंने इस मुद्दे को उठाया, वह एक आदर्श जनप्रतिनिधि के कर्तव्यबोध का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इस प्रयास को और अधिक बल मिला वरिष्ठ सांसद तथा संसदीय समिति (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति कल्याण) के अध्यक्ष श्री फग्गन सिंह कुलस्ते के प्रभावी हस्तक्षेप से। उनके व्यापक संसदीय अनुभव और सशक्त नेतृत्व ने यह सुनिश्चित किया कि प्रशासन इस गंभीर विषय को नज़रअंदाज़ न कर सके और उसे उत्तरदायित्व के दायरे में आना ही पड़ा। हालाँकि, इस पूरे प्रकरण में BHEL की एक अत्यंत गंभीर, संवैधानिक रूप से आपत्तिजनक और निंदनीय गलती भी उजागर हुई है। समयपूर्व सेवानिवृत्ति से संबंधित आधिकारिक अभिलेखों में कर्मचारियों की जाति श्रेणी (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/सामान्य) का उल्लेख किया गया, जबकि किसी भी कर्मचारी की कार्यकुशलता, ईमानदारी, आचरण या सेवा-निष्ठा के मूल्यांकन में जाति का कोई भी प्रासंगिक या वैधानिक आधार नहीं हो सकता। ऐसे संवेदनशील प्रशासनिक निर्णयों में जाति का समावेश न केवल पूर्णतः अनावश्यक है, बल्कि यह परोक्ष भेदभाव (Indirect Discrimination) की गंभीर आशंका को जन्म देता है। यह कृत्य सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की संवैधानिक गारंटी प्रदान करने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 की भावना और उद्देश्य के प्रतिकूल है। यह प्रवृत्ति BHEL जैसी प्रतिष्ठित सार्वजनिक उपक्रम की प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाती है और संविधान की मूल आत्मा—समानता, न्याय और निष्पक्षता—पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
यह पूरा घटनाक्रम यह भी स्पष्ट करता है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में संवेदनशील शासन, जवाबदेह प्रशासन और अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचाने की प्रतिबद्धता केवल कथनों तक सीमित नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई में परिलक्षित होती है। सुशासन तथा सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के सिद्धांतों पर चलती सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि सार्वजनिक उपक्रमों में भी अन्याय के विरुद्ध त्वरित, निष्पक्ष और निर्णायक हस्तक्षेप संभव हो सके। अंततः, यह पूरा प्रकरण यह भी सिद्ध करता है कि संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत स्थापित राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग केवल एक औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि अधिकारों की रक्षा का एक सशक्त संवैधानिक प्रहरी है। आयोग द्वारा समय पर की गई कार्यवाही और रिपोर्ट तलब करने के निर्देशों ने एक प्रभावी सेफ्टी वाल्व का कार्य किया। केंद्रीय मंत्री का निर्णायक नेतृत्व, स्थानीय सांसद की मजबूत और संवेदनशील पैरवी, वरिष्ठ सांसद का मार्गदर्शन तथा संवैधानिक आयोग की सख्ती—इन सभी के संयुक्त प्रयासों से 23 कर्मचारियों और उनके परिवारों के जीवन में फिर से सम्मान, सुरक्षा और खुशियाँ लौट आई हैं।


