जनजातीय कला-संस्कृति के संरक्षण और कलाकारों के सम्मान महोत्सव का आयोजन
16 जनवरी को जनपद पंचायत सुकमा, कोंटा मुख्यालय में होगा आयोजन
सुकमा, 08 जनवरी 2026/sns/- मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के निर्देशन में जनजातीय बाहुल्य बस्तर संभाग की समृद्ध लोककला एवं संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और सतत् विकास के उद्देश्य से बस्तर पंडुम 2026 का आयोजन किया जा रहा है।
तीन चरणों में होगा आयोजन
बस्तर पंडुम 2026 का आयोजन तीन चरणों में किया जाएगा। प्रथम चरण में जनपद स्तरीय प्रतियोगिता आयोजित होगी, द्वितीय चरण में जिला स्तरीय तथा तृतीय चरण में संभाग स्तरीय प्रतियोगिता संपन्न होगी।
कलेक्टर श्री अमित कुमार के निर्देशन एवं सीईओ जिला पंचायत श्री मुकुन्द ठाकुर के मार्गदर्शन में प्रथम चरण के अंतर्गत जनपद स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन 16 जनवरी 2026 को किया जाएगा।
जिले के जनपद पंचायत सुकमा एवं कोंटा विकासखंड में प्रतियोगिताएं 16 जनवरी 2026 को आयोजित की जाएंगी।
निःशुल्क ऑफलाइन आवेदन, ग्राम पंचायत स्तर से आमंत्रण
इस प्रतियोगिता में ग्राम पंचायत स्तर से 12 विधाओं से संबंधित सभी कलाकारों एवं कला समूहों को जनपद स्तरीय प्रतियोगिता में सम्मिलित होने हेतु निःशुल्क ऑफलाइन आवेदन के माध्यम से आमंत्रित किया गया है। प्रत्येक विधा से एक-एक दल अथवा समूह प्रतिभाग करेगा। आवेदनों हेतु ग्राम पंचायत के सचिव अथवा जनपद पंचायत मुख्यालय से संपर्क कर सकते है।
पुरस्कार एवं प्रोत्साहन राशि
जनपद स्तरीय प्रतियोगिता में प्रत्येक विधा के विजेता दल को 10 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी।
द्वितीय चरण जिला स्तरीय प्रतियोगिता में प्रत्येक विधा से चयनित एक-एक दल को अवसर मिलेगा, जहां विजेता दल को 20 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।
तृतीय चरण में संभाग स्तरीय प्रतियोगिता आयोजित होगी, जिसमें बस्तर संभाग के 7 जिलों की 12 विधाओं के कुल 84 प्रतिभागी दल (जिला स्तरीय विजेता) भाग लेंगे। संभाग स्तर पर प्रथम पुरस्कार 50 हजार रुपये, द्वितीय पुरस्कार 30 हजार रुपये और तृतीय पुरस्कार 20 हजार रुपये तथा शेष प्रतिभागी दलों को 10 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी।
बस्तर पंडुम की 12 विधाएं शामिल
बस्तर पंडुम 2026 में बस्तर की जनजातीय संस्कृति की विविध झलक इन 12 प्रमुख विधाओं में देखने को मिलेगी। जिसमें जनजातीय नृत्य – गेड़ी, गौर-माड़िया, ककसार, मांदरी, दण्डामी, एबालतोर, दोरला, पेंडुल, हुलकीपाटा, परब, घोटुलपाटा, कोलांगपाटा, डंडारी, देवकोलांग, पूसकोलांग, जीतने कोकरेंग (आखेट नृत्य) आदि।
जनजातीय गीत – घोटुलपाटा, लिंगोपेन, चौतपरब, रिलो, लेजा, कोटनी, गोपल्ला, जगारगीत, धनकुल, मरमपाटा, हुलकीपाटा आदि।
जनजातीय नाट्य – माओपाटा, भतरा, लोकनाट्य आदि।
जनजातीय वाद्ययंत्रों का प्रदर्शन – धनकुल, डोल, चिटकुल, तोड़ी, अकुम, बावासी, मांदर, मृदंग, सारंगी, गुदुम, मोहरी, चिकारा सहित अन्य वाद्य। जनजातीय वेशभूषा का प्रदर्शन दृ पाटा-लुगा, छेद्रा, भदई आदि।
जनजातीय आभूषणों का प्रदर्शन – लुरकी, करधन, सुतिया, बिछिया, फुली, नांगमोरी, मुंदरी, सुर्रा सहित पारंपरिक आभूषण। जनजातीय शिल्प दृ धड़वा, माटीकला, काष्ठ, ढोकरा, लौह, प्रस्तर, गोदना, भित्तिचित्र, बांस एवं घास शिल्प। जनजातीय चित्रकला-मुरिया पेंटिंग, गोंड पेंटिंग आदि।
जनजातीय पेय पदार्थ – सल्फी, ताड़ी, हंडिया, पेज, मांड़, अमारी शरबत एवं चटनियां।
जनजातीय व्यंजन – चापड़ा चटनी, आमटा, बांस की सब्जी, मुठिया, तेंदुपत्ता की सब्जी, सालेभाजी आदि।
आंचलिक साहित्य – लोककथाएं, गीत, लोकनाट्य एवं मौखिक परंपराओं का प्रस्तुतीकरण।
बस्तर वन औषधि – सर्पगंधा, गुंजा, महुआ, चिरायता, ब्राम्ही, अश्वगंधा सहित पारंपरिक औषधियां शामिल है।

