छत्तीसगढ़

पद्मश्री राधेश्याम बारले की टीम ने बाबा गुरु घासीदास के संदेशों पर दी जीवंत प्रस्तुति


रायगढ़, 01 सितम्बर 2025/sns/- चक्रधर समारोह 2025 के चौथे दिन की शाम छत्तीसगढ़ की लोकनृत्य परंपरा के ध्वजवाहक पद्मश्री राधेश्याम बारले की टीम ने पंथी नृत्य की अद्भुत प्रस्तुति देकर माहौल को भक्तिमय बना दिया। टीम ने गुरु घासीदास के संदेशों पर आधारित नृत्य की भाव-भंगिमाओं से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। सुर-ताल और लय की सटीकता से प्रस्तुति में लोकसंगीत और आध्यात्मिकता का सुंदर संगम दिखा।
पद्मश्री श्री बारले पंथी नृत्य के सुप्रसिद्ध नर्तक हैं, जिनका नाम देश-दुनिया में मशहूर है। वे बचपन से ही इन नृत्य शैली को अपनाया है। नृत्य करने के साथ उन्होंने कई देशों के नर्तकों को पंथी नृत्य की प्रशिक्षण दी है। श्री राधेश्माम बारले ने पंथी नृत्य के जरिये बाबा गुरु घासीदास के संदेशों को देश-दुनिया में प्रचारित और प्रसारित किया है। गुरु घासीदास के संदेशों को प्रसारित करने में उनका अमूल्य योगदान रहा है, जिसे देखते हुए 9 नवंबर 2021 को भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ सरकार भी उन्हें सम्मानित कर चुकी है। पद्मश्री राधेश्याम बारले का जन्म दुर्ग जिले में हुआ। उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से लोकसंगीत में पत्रोंपाधी प्राप्त की है।

क्या होता है पंथी नृत्य
पंथी नृत्य में सतनाम पंथ के प्रवर्तक बाबा गुरु घासीदास के जीवन और उनके उपदेश मनखे-मनखे एक समान, सत्य, समानता और सामाजिक एकता पर आधारित “सतनाम” (सत्य ही ईश्वर है) के संदेश का गायन किया जाता है। इस नृत्य में एक मुख्य नर्तक होता है, जो गायन की शुरुआत करता है और उसके साथ बाकी साथी नृत्य और गायन करते हैं। पद्मश्री श्री बारले मुख्य नर्तक होते हैं, जो बाबा घासीदास के गायन और उपदेश को शुरू करते हैं। उनके साथ बाकी नर्तक उसे दोहराते हैं और गायन करते हैं। यह नृत्य बहुत धीमी गति से शुरू होता है और इसके साथ मांदर की ताल बजती है धीरे-धीरे गायन और नृत्य बढ़ता जाता है। अंत में गायन खत्म होने से पहले नृत्य और गायन काफी तेज हो जाता है। नृत्य की इस शैली में मांदर और झांझ बजाया जाता है यही दोनों मुख्य वाद्य यंत्र होते हैं। नृत्य की इस शैली में नर्तक अपने पैरों में घुंघरू बांधकर नृत्य करते हैं। गौरतलब है कि चक्रधर समारोह रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान है, जो नृत्य, संगीत और लोक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन का प्रतीक है।

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