बलौदाबाजार, 07 फ़रवरी 2026/sns/- वनमण्डलाधिकारी गणवीर धम्मशील के निर्देशानुसार वनों को अग्नि से होने वाली क्षति से बचाने तथा अग्नि सीजन 2026 के दौरान प्रभावी रोकथाम सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बलौदाबाजार वनमण्डल में परिक्षेत्र एवं वनमण्डल स्तर पर अग्नि सुरक्षा कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। इन कार्यशालाओं का उद्देश्य फील्ड स्तर पर कार्यरत वन अमले के साथ-साथ स्थानीय समुदाय को वनाग्नि रोकथाम के प्रति जागरूक करना तथा आपसी समन्वय को मजबूत बनाना है, ताकि समय रहते आग की घटनाओं को रोका जा सके।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार दिनांक 07 फरवरी 2026 को बल्दाकछार परिक्षेत्र में, 09 फरवरी 2026 को सोनाखान परिक्षेत्र में तथा 10 फरवरी 2026 को अर्जुनी परिक्षेत्र में अग्नि सुरक्षा कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा। इसके पश्चात 11 फरवरी 2026 को बारनवापारा एवं कोठारी परिक्षेत्रों में संयुक्त रूप से कार्यशाला आयोजित की जाएगी, जबकि 12 फरवरी 2026 को बलौदाबाजार परिक्षेत्र में कार्यशाला संपन्न होगी। अंत में 13 फरवरी 2026 को देवपुर में वनमण्डल स्तरीय अग्नि सुरक्षा कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा।
इन कार्यशालाओं में वनरक्षक, वनपाल, उपवनक्षेत्रपाल, फायर वाचर्स, संयुक्त वन प्रबंधन समिति के सदस्य, स्थानीय जनप्रतिनिधि, शिक्षक, अन्य शासकीय कर्मचारी, स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि तथा स्व सहायता समूहों के सदस्यों को सम्मिलित किया जाएगा। प्रत्येक कार्यशाला में अधिक से अधिक प्रतिभागियों की सहभागिता सुनिश्चित की जाएगी ताकि वनाग्नि रोकथाम के लिए व्यापक जनभागीदारी विकसित हो सके और जिम्मेदारी सामूहिक रूप से निभाई जा सके।
वनाग्नि की सूचना को समय पर साझा करने हेतु व्यापक स्तर पर ग्रामीणों का पंजीकरण कर फायर अलर्ट सिस्टम से जोड़ा जा रहा है। प्रत्येक गांव के अधिक से अधिक लोगों को इस अलर्ट व्यवस्था में शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे किसी भी संभावित आग की स्थिति में स्थानीय स्तर पर तुरंत रोकथाम की जा सके।साथ ही, जागरूकता बढ़ाने के लिए अभिनव उपाय अपनाए जा रहे हैं। नुक्कड़ नाटक, दीवार लेखनएवं जनसंपर्क गतिविधियों के माध्यम से ग्रामीणों, युवाओं एवं स्थानीय समुदाय को वनाग्नि के दुष्परिणामों और रोकथाम के उपायों के बारे में जानकारी दी जा रही है। पूर्व वर्षों के अनुभवों के आधार पर कोठारी एवं बारनवापारा परिक्षेत्रों को एक सफल मॉडल के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ पिछले तीन वर्षों में ग्रामीण सहभागिता और वन कर्मचारियों की सक्रियता के कारण आग की घटनाएँ अत्यंत न्यूनतम रही हैं। इस मॉडल को अन्य परिक्षेत्रों में भी अपनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

